मेरे हृदय से
मेरा "मैं" विलुप्त हो
गया।
निज मन की
बेड़ियों से अब
मैं मुक्त हो
गया।।
अब नहीं है
कामना इनसे मिलूँ,
उनको रिझाऊँ
अब
नहीं है द्वेष,
न है राग, तो कैसे
जताऊँ।
अब नहीं मुझको धरा
की दैन्यता पर
क्षोभ किंचित,
अब
नहीं उल्लास, कि
आकाश सा सर्वस
लुटाऊँ।
इस हृदय में उठने
वाला भावना का
ज्वार,
जो अब तक था
उपनिषद, वो अब निरुक्त हो गया।
निज मन
की....
धन्य है वैशिष्ट
वह, अपनत्व के
जो स्वर उभारे,
धन्य है वैशिष्ट
जो कारुण्य के
दीपक उज़ारे।
पर
नहीं वैशिष्ट अपने
हेय के भी योग्य वह
जो,
स्वार्थ से
हो जन्य, पोषित,
क्षुद्रता का मुकुट
धारे।
हे क्षितिज
के राम! रावण
को पुनः अब मुक्त कर
दो,
मेरे मन का राम
तो अब सुप्त
हो गया।
निज
मन की...
आयु बीती बस
लुटाते हृदय के अनुदान सारे,
बस यूँ ही
अगणित जनों पर हमने अपने
प्राण वारे।
किन्तु
अब दुनिया को
मुरलीधर सुहाता ही
नहीं है,
चाहते
ही हैं, कि वो मुरली
तजे और चक्र धारे।
कर्म
के अनुसार मेरी
अब हैं सारी
नीतियाँ
मैं यम हूँ, मैं
शनि, मैं चित्रगुप्त
हो गया।
निज
मन की....
- रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"

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