उत्साह प्रबल, अनुराग शून्य, पुरुषार्थ प्रबल, सन्यास शून्य।
सबमें जो सहज प्रकट था वह रामायण का वनवास शून्य।
विधि की गति अब हो गयी गौण, बस गतिविधियाँ ही जारी हैं।
कोई समझे या ना समझे, यह सम्वत् प्रलयंकारी है।।
जो निज तन-मन को छोड़ सकल जन के मन के अनुरागी थे।
यश, धन, पद सबका मोह छोड़, जो कबिरा से बैरागी थे।
अपने तप, त्याग, तितिक्षा से, प्रतिबद्धित हो लेकर मशाल,
जो कालचक्र के परिवर्तन में युगऋषि के सहभागी थे।
वे आज त्याग कर युग प्रभार, बन बैठे मात्र प्रभारी हैं!
कोई समझे या ना समझे…
जो परम्परा की तुलना में निज सद्विवेक अपनाते हैं।
पत्थर हो जाएँ द्रवीभूत ऐसे शुभ योग बनाते हैं।
‘एकला चलो’ के नारे में, निश्चित होगा अनुपम प्रताप,
पर एक साथ चलकर देखो, हम क्या से क्या कर जाते हैं।
त्रेता बीता, अब इस नवयुग के हनुमानों की बारी है!
कोई समझे या ना समझे…
- रोहित श्रीवास्तव ‘अथर्व’
सबमें जो सहज प्रकट था वह रामायण का वनवास शून्य।
विधि की गति अब हो गयी गौण, बस गतिविधियाँ ही जारी हैं।
कोई समझे या ना समझे, यह सम्वत् प्रलयंकारी है।।
जो निज तन-मन को छोड़ सकल जन के मन के अनुरागी थे।
यश, धन, पद सबका मोह छोड़, जो कबिरा से बैरागी थे।
अपने तप, त्याग, तितिक्षा से, प्रतिबद्धित हो लेकर मशाल,
जो कालचक्र के परिवर्तन में युगऋषि के सहभागी थे।
वे आज त्याग कर युग प्रभार, बन बैठे मात्र प्रभारी हैं!
कोई समझे या ना समझे…
जो परम्परा की तुलना में निज सद्विवेक अपनाते हैं।
पत्थर हो जाएँ द्रवीभूत ऐसे शुभ योग बनाते हैं।
‘एकला चलो’ के नारे में, निश्चित होगा अनुपम प्रताप,
पर एक साथ चलकर देखो, हम क्या से क्या कर जाते हैं।
त्रेता बीता, अब इस नवयुग के हनुमानों की बारी है!
कोई समझे या ना समझे…
- रोहित श्रीवास्तव ‘अथर्व’

