Thursday, May 9, 2019
Sunday, April 28, 2019
यह सम्वत् प्रलयंकारी है
उत्साह प्रबल, अनुराग शून्य, पुरुषार्थ प्रबल, सन्यास शून्य।
सबमें जो सहज प्रकट था वह रामायण का वनवास शून्य।
विधि की गति अब हो गयी गौण, बस गतिविधियाँ ही जारी हैं।
कोई समझे या ना समझे, यह सम्वत् प्रलयंकारी है।।
जो निज तन-मन को छोड़ सकल जन के मन के अनुरागी थे।
यश, धन, पद सबका मोह छोड़, जो कबिरा से बैरागी थे।
अपने तप, त्याग, तितिक्षा से, प्रतिबद्धित हो लेकर मशाल,
जो कालचक्र के परिवर्तन में युगऋषि के सहभागी थे।
वे आज त्याग कर युग प्रभार, बन बैठे मात्र प्रभारी हैं!
कोई समझे या ना समझे…
जो परम्परा की तुलना में निज सद्विवेक अपनाते हैं।
पत्थर हो जाएँ द्रवीभूत ऐसे शुभ योग बनाते हैं।
‘एकला चलो’ के नारे में, निश्चित होगा अनुपम प्रताप,
पर एक साथ चलकर देखो, हम क्या से क्या कर जाते हैं।
त्रेता बीता, अब इस नवयुग के हनुमानों की बारी है!
कोई समझे या ना समझे…
- रोहित श्रीवास्तव ‘अथर्व’
सबमें जो सहज प्रकट था वह रामायण का वनवास शून्य।
विधि की गति अब हो गयी गौण, बस गतिविधियाँ ही जारी हैं।
कोई समझे या ना समझे, यह सम्वत् प्रलयंकारी है।।
जो निज तन-मन को छोड़ सकल जन के मन के अनुरागी थे।
यश, धन, पद सबका मोह छोड़, जो कबिरा से बैरागी थे।
अपने तप, त्याग, तितिक्षा से, प्रतिबद्धित हो लेकर मशाल,
जो कालचक्र के परिवर्तन में युगऋषि के सहभागी थे।
वे आज त्याग कर युग प्रभार, बन बैठे मात्र प्रभारी हैं!
कोई समझे या ना समझे…
जो परम्परा की तुलना में निज सद्विवेक अपनाते हैं।
पत्थर हो जाएँ द्रवीभूत ऐसे शुभ योग बनाते हैं।
‘एकला चलो’ के नारे में, निश्चित होगा अनुपम प्रताप,
पर एक साथ चलकर देखो, हम क्या से क्या कर जाते हैं।
त्रेता बीता, अब इस नवयुग के हनुमानों की बारी है!
कोई समझे या ना समझे…
- रोहित श्रीवास्तव ‘अथर्व’
Thursday, April 18, 2019
मतदान करें...
जो सच्चे राष्ट्र भक्त हैं, खुद पर इतना तो एहसान करें।
बाकी सारी बातें छोड़ें, सबसे पहले मतदान करें।।
ये वक्त नहीं वह, जब सुभाष ने रक्त हमारा माँगा था।
आज़ाद, भगत सिंह, बिस्मिल ने, जब हँसकर जीवन त्यागा था।
जब वीर शिवा ने अफ़ज़ल को नख से कर डाला था विदीर्ण,
जब मर्दानी जाज्वल्यमान थी, गोरा-बादल जागा था।।
हम आज मात्र इतना कर लें, बलिदानों पर अभिमान करें।
बाकी सारी बातें छोड़ें…
जब राष्ट्र संगठित हो, अगणित अनुदान बरसते ईशों से।
हमको बनना है जगद्गुरु, अब पुनः दैव-आशीषों से।
डलती हैं राष्ट्र-यज्ञ में जब निष्काम कर्म की आहुतियाँ,
तब रुके नहीं रुकता प्रवाह, दुनिया के सत्ताधीशों से ।
गर यह भारत “माँ” है, तो माँ का इतना तो सम्मान करें।
बाकी सारी बातें छोड़ें…
जो अभी नहीं चेते, वे कल ना पूछें “हमने क्या पाया?”
जो अभी पड़े हैं निष्क्रिय, कल ना बोलें “सब प्रभु की माया!”
उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न सँजोए कल जो पीढ़ी आएगी,
कल बिलख-बिलख कर गाएगी, ये गीत जो हमने ना गाया।
अपने कल को
चाहे बिसरें, उनके कल का निर्माण करें।
बाकी सारी बातें छोड़ें…
Tuesday, November 27, 2018
भजन
जिसको
स्वप्न दिए हों नभ
के, उसे क्षितिज पर
मत तजना।
पर्णकुटी की गरिमा बनना,
स्वर्णमहल में मत सजना।
भक्ति-गान के ग्रन्थों
में हैं तेतिस कोटि
देव मगर,
नाम भजन
बस एक का करना,
सब भजनों को मत भजना।।
- रोहित "अथर्व"
Monday, October 29, 2018
।।उज्ज्वल भविष्यत कामना।।
आप
घेरें तम, मैं रखूँ
दीप की प्रस्तावना।
इस
दिवाली आपकी उज्ज्वल भविष्यत
कामना।।
मेरे
मन का दीप जब
तक है प्रखर, सालोक्य
पर।
तमस भी यह
आपका सीमित है, छाया भूमि
पर।
स्नेह घृत से प्रज्ज्वलित
जो है सहज बुझता
नहीं,
लाख झंझावात आएँ,
प्रेम की ज्योति प्रखर।।
आपका छल - प्रेम मेरा,
मिल बने प्रभु प्रार्थना।
इस दिवाली आपकी उज्ज्वल भविष्यत
कामना।।
वह
लता जो वृक्ष के
शोषण में पूर्ण समर्थ
है।
फिर भले कितने
ही स्वर्णिम पुष्प दे, सब व्यर्थ
है।
दूरदृष्टि से न माली
यदि उचित संज्ञान ले,
होगा निश्चित ध्वंस इसका बस यही
इक अर्थ है।।
स्वार्थ
कर्मठ मात्र मूर्छित मौन मन की
भावना।
इस दिवाली आपकी
उज्ज्वल भविष्यत कामना।।
क्षितिज
के उस पार भी
आकाश का विस्तार है।
सब दिशाएँ कह रहीं वह
नवसृजन का द्वार है।
कर्म के अनुदान के
आह्वान जो नित कर
रहा,
स्नेह की अभिव्यक्ति भी
जिसको सहज स्वीकार है।।
है मधुर इस ज्ञात
से, अज्ञात की सम्भावना।
इस
दिवाली आपकी उज्ज्वल भविष्यत
कामना।।
Monday, July 31, 2017
निज मन की बेड़ियों से...
मेरे हृदय से
मेरा "मैं" विलुप्त हो
गया।
निज मन की
बेड़ियों से अब
मैं मुक्त हो
गया।।
अब नहीं है
कामना इनसे मिलूँ,
उनको रिझाऊँ
अब
नहीं है द्वेष,
न है राग, तो कैसे
जताऊँ।
अब नहीं मुझको धरा
की दैन्यता पर
क्षोभ किंचित,
अब
नहीं उल्लास, कि
आकाश सा सर्वस
लुटाऊँ।
इस हृदय में उठने
वाला भावना का
ज्वार,
जो अब तक था
उपनिषद, वो अब निरुक्त हो गया।
निज मन
की....
धन्य है वैशिष्ट
वह, अपनत्व के
जो स्वर उभारे,
धन्य है वैशिष्ट
जो कारुण्य के
दीपक उज़ारे।
पर
नहीं वैशिष्ट अपने
हेय के भी योग्य वह
जो,
स्वार्थ से
हो जन्य, पोषित,
क्षुद्रता का मुकुट
धारे।
हे क्षितिज
के राम! रावण
को पुनः अब मुक्त कर
दो,
मेरे मन का राम
तो अब सुप्त
हो गया।
निज
मन की...
आयु बीती बस
लुटाते हृदय के अनुदान सारे,
बस यूँ ही
अगणित जनों पर हमने अपने
प्राण वारे।
किन्तु
अब दुनिया को
मुरलीधर सुहाता ही
नहीं है,
चाहते
ही हैं, कि वो मुरली
तजे और चक्र धारे।
कर्म
के अनुसार मेरी
अब हैं सारी
नीतियाँ
मैं यम हूँ, मैं
शनि, मैं चित्रगुप्त
हो गया।
निज
मन की....
- रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"
Friday, September 25, 2015
केवल
व्यथित उर का हर एक कण हो तो "बेकल" जन्म लेता है।
जो पिघले भाव-घन, निष्छल नयनजल जन्म लेता है।
अहम् से, स्वार्थ से उत्पन्न होता है "चयन" लेकिन,
समर्पित जब समर्पण हो तो "केवल" जन्म लेता है।
- रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"
जो पिघले भाव-घन, निष्छल नयनजल जन्म लेता है।
अहम् से, स्वार्थ से उत्पन्न होता है "चयन" लेकिन,
समर्पित जब समर्पण हो तो "केवल" जन्म लेता है।
- रोहित श्रीवास्तव "अथर्व"
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