Monday, October 29, 2018

।।उज्ज्वल भविष्यत कामना।।

आप घेरें तम, मैं रखूँ दीप की प्रस्तावना। 
इस दिवाली आपकी उज्ज्वल भविष्यत कामना।।

मेरे मन का दीप जब तक है प्रखर, सालोक्य पर। 
तमस भी यह आपका सीमित है, छाया भूमि पर। 
स्नेह घृत से प्रज्ज्वलित जो है सहज बुझता नहीं
लाख झंझावात आएँ, प्रेम की ज्योति प्रखर।। 
आपका छल - प्रेम मेरा, मिल बने प्रभु प्रार्थना। 
इस दिवाली आपकी उज्ज्वल भविष्यत कामना।।

वह लता जो वृक्ष के शोषण में पूर्ण समर्थ है। 
फिर भले कितने ही स्वर्णिम पुष्प दे, सब व्यर्थ है। 
दूरदृष्टि से माली यदि उचित संज्ञान ले
होगा निश्चित ध्वंस इसका बस यही इक अर्थ है।। 
स्वार्थ कर्मठ मात्र मूर्छित मौन मन की भावना। 
इस दिवाली आपकी उज्ज्वल भविष्यत कामना।।

क्षितिज के उस पार भी आकाश का विस्तार है। 
सब दिशाएँ कह रहीं वह नवसृजन का द्वार है। 
कर्म के अनुदान के आह्वान जो नित कर रहा
स्नेह की अभिव्यक्ति भी जिसको सहज स्वीकार है।। 
है मधुर इस ज्ञात से, अज्ञात की सम्भावना। 
इस दिवाली आपकी उज्ज्वल भविष्यत कामना।।

 - रोहित श्रीवास्तवअथर्व