ख्वाहिशें तो बहुत हैं, पर कह रहा हूँ चंद, ताकि,
जिसका जो सोचा वही अंजाम होना चाहिए!
खुद-ब-खुद मिट जाएगा, गम का अंधेरा क़ौम से,
इंसानियत का बस, बशर को भान होना चाहिए!
वीर हो किंचित ना थामो, तुम खड़ग को ही भले,
हुंकार भर से दूर तक सुनसान होना चाहिए!
ज़िंदगी है क़ौम की, गर मानते हो तुम निजी,
तो मौत सबके नाम एक पैगाम होना चाहिए!
जिस राह की रज को कभी छूने मिले हैं गुरु-चरण,
उस राह के पाषाण को भगवान होना चाहिए!
दूर माँ की गोद से हूँ, चंद सिक्कों के लिए,
उसका लिखा भी कभी नाकाम होना चाहिए!
क्यों नहीं सुनता वो मेरी, ख्वाहिशें जो भी कहीं,
फरिश्तों को भी कभी नादान होना चाहिए!
इतना सुन ले, या कि मेरी मान ले बस इक दुआ,
कि जी चुका हूँ बहुत, अब 'निर्वाण' होना चाहिए!
- रोहित श्रीवास्तव 'अथर्व'
Wednesday, July 8, 2009
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