मेरा निज का कोई रूप नहीं,
कोई छाँव नहीं कोई धूप नहीं!
परहित स्वच्छन्द मेरा विचरण,
मैं तुच्छ स्वार्थी कूप नहीं!!
सूखे अधरों की राहत हूँ, ज्येष्ठ में श्रावणी आहट हूँ!
मैं निर्झरिणी सुर-सरिता हूँ! मैं कविता हूँ !!
मैं सत्य सनातन शब्द सदा,
मैं सार्वभौम सर्वत्र सदा!
सृष्टि, सुर, शशि, सागर सब में,
मेरा शाश्वत शुभ सत्व सदा!!
मैं सहस्रार साकार हूँ, सहृदयता, संबल, सार हूँ!
मैं स्वर्णिम शीतल सविता हूँ! मैं कविता हूँ !!
मैं सौम्य सुगंधित चंदन हूँ,
शिशुओं का कोमल क्रंदन हूँ!
सारा ब्रह्मांड बसा जिनमें,
मैं उन चरणों का वंदन हूँ!!
मेरा गुरु जीता है मुझमें, मैं अपने गुरु में जीता हूँ!
मैं उसकी ही परिणीता हूँ! मैं कविता हूँ !!
मैं सबके मन में प्राणों में,
उल्लासित उर की तानों में!
ममता, उदारता, करुणा में,
हूँ अमर प्रेम बलिदानो में!!
मैं वीर शौर्य हूँ साहस में, मैं पूर्ण उदित हूँ मावस में!
हरि के हर पल में बीता हूँ! मैं कविता हूँ !!
उज्ज्वल हूँ दीप दिवाली सा,
हूँ प्रखर सूर्य की लाली सा!
शीतल हूँ चन्द्र-शरद जैसा,
पुलकित बगिया के माली सा!!
बिखरे घावों को सीता हूँ, और पीर पराई पीता हूँ!
बस इसीलिए तो कविता हूँ!!
- रोहित श्रीवास्तव 'अथर्व'
Tuesday, April 14, 2009
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