Monday, March 7, 2011

हर मन 'नारी' सा लगता है!!

बाहर हो रूप भले कोई पर मन 'नारी' सा लगता है!
हर मन 'नारी' सा लगता है!!

निर्झर, शशि, रवि, तरु, मेघ, पवन सब दाता ही कहलाते हैं,
नि:स्वार्थ निरत सर्वत्र सदा अनुदान लुटाते जाते हैं!
बाँटना, लुटाना, खप जाना - ये सब गुण हैं बस जननी के,
तब ही तो धरती "माँ" है, और ये उसके अंश कहाते हैं!!
जो पाते हैं अनुदान सतत, वे तो कृत-कृत्य हुए ही हैं,
पर जिसने इन्हें बनाया, वह भी आभारी सा लगता है!
बाहर हो रूप भले कोई...

जीवन है कठिन अवश्य, किंतु कुछ लोग बड़े सहयोगी हैं,
ऊपर से दिखते स्वस्थ, मगर सब "स्नेह-रोग" के रोगी हैं!
कठिनाई आते ही आते, संकट मिटने पर ही जाते,
जैसे मेरी पीड़ा और वे, इक-दूजे के प्रतियोगी हैं!!
दुष्कर जीवन-संग्राम में 'लक्ष्मीबाई' नहीं हूँ मैं लेकिन,
उनका यूँ साथ निभाना मुझको 'झलकारी' सा लगता है!
बाहर हो रूप भले कोई...

गुरु, माता और पिता, तीनों ही इस जीवन के दायक हैं,
शिक्षा, विद्या, प्रतिभा, क्षमता, संस्कारों के उन्नायक हैं!
वंदूँ इनको, पूजूँ इनको, भज लूँ इनको, जप लूँ इनको,
ये ही मेरे अंतस में बहती 'गायत्री' के गायक हैं!!
हर श्वांस, हरेक रक्त-कणिका, हर धड़कन सदा ऋणी इनकी,
पर दूर हूँ इनसे इतना, जीवन लाचारी सा लगता है!
बाहर हो रूप भले कोई...

कुछ पुष्प हैं मुरझाए से, जिनको मधुबन में चुनना चाहूँ,
उर के पार्थिव सदभावों से, संगीत मधुर सुनना चाहूँ!
यूँ ही जो लिखकर छूट रहे हैं, कल के बिखरे पन्नों पर,
उन शब्दों को तरुणाई देकर, गीत नया गुनना चाहूँ!!
उन अर्द्धरचित से गीतों में, अनजाने हैं कुछ लोग मगर,
उन अनजाने रिश्तों का अपनापन भारी सा लगता है!
बाहर हो रूप भले कोई पर मन 'नारी' सा लगता है,
हर मन 'नारी' सा लगता है!!

                                                   - रोहित श्रीवास्तव 'अथर्व'

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस २०११ पर विशेष!

3 comments:

  1. Bahut badiya.....
    Ati uttam....... :)
    Jhalkari, bhari apnapan....hriday sparshi panktiyan..... :)

    ReplyDelete
  2. sundar bhavpoorna, behatareen rachnaa..:),anandit karne wale shabd, anandit karne wali bhavnayein..:D

    ReplyDelete